Monday, August 6, 2007

आत्मा का राग

ज्ञान के अन्य अनुशासनों की तरह कविता भी जीवन को समझने का एक उपक्रम है, अलबत्ता अधिक आनंदप्रद उपक्रम । कविता में मन को रंजित करने का तत्व होता है पर कविता प्रचलित अर्थों में मनोरंजन की विधा नहीं है। कविता हमारे अंतर्जगत को आलोकित करती है । वह भाषा की स्मृति है । खांटी दुनियादार लोगों की जीवन-परिधि में कविता कदाचित विजातीय तत्व हो सकती है, पर कविता के लोकतंत्र में रहने वाले सहृदय सामाजिकों के लिये कविता – सोशल इंजीनियरिंग का — प्रबोधन का मार्ग है । कविता मनुष्यता की पुकार है । प्रार्थना का सबसे बेहतर तरीका । जीवन में जो कुछ सुघड़ और सुन्दर है कविता उसे बचाने का सबसे सशक्त माध्यम है । कठिन से कठिन दौर में भी कविता हमें प्राणवान रखती है और सीख देती है कि कल्पना और सपनों का संसार अनंत है ।
कविता एक किस्म का सामाजिक संवाद है । पर यह संवाद इधर कुछ एकपक्षीय-सा हो चला है । कवि और पाठक/श्रोता के बीच एक किस्म की संवादहीनता की स्थिति बनती दिख रही है । यह अबोलापन निश्चित रूप से कविता के इलाके को — उसके प्रभाव-क्षेत्र को – सीमित कर रहा है । यह सच है कि कोई भी नकली सभ्यता कविता से उसके रंग,ध्वनियां और संकेत नहीं छीन सकती। पर इधर कविता पर कुछ नए दबाव बन रहे हैं। कविता की लोकप्रियता और प्रभावकारिता के बारे में पहले भी कई रोचक बहसें हो चुकी हैं । अतः इस चिट्ठे का उद्देश्य काव्य-विमर्श मात्र नहीं है । यह चिट्ठा हिंदी कविता तथा हिंदी में अनूदित अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं की अनूठी कविताओं का प्रतिनिधि काव्य-मंच बनने का आकांक्षा-स्थल है — सभी काव्यप्रेमियों का आत्मीय संवाद-स्थल जहां बेहरीन कविताएं तो होंगी ही , साथ ही होंगी उन कविताओं पर आपकी सुचिंतित टिप्पणियां ।

10 comments:

anitakumar said...

आपका प्रयास सराहनीय है, हमें आप के ब्लोग पर उन कविताओं का इंतजार रहेगा। हम भी कविता के रसिया हैं।
मेरे ब्लोग पर आने का धन्यवाद यहीं दे रही हूँ क्यों कि आप का इ-मेल पता नही है मेरे पास्। देने की कृपा करें।

Avanish Gautam said...

स्वागत!

सतीश सक्सेना said...
This comment has been removed by the author.
सतीश सक्सेना said...

प्रियंकर जी के आश्वासन के लिए हार्दिक आभार !
और यही शब्द हमारी जीत भी है जिसका हमें शुरू से विश्वास था ! मगर जरूरत है की आप जैसे मशहूर नाम कलम से इसका जवाब देन ! हमारे इस शानदार देश से भय और अविश्वास का माहौल ख़त्म करवाने के लिए रुढियों, पुराने सडे गले रीतिरिवाजों और सुनी सुनाई गाथाओं से बाहर निकलने में आप सब को आगे आना चाहिए. अन्यथा हममें और पकिस्तान में फर्क ही क्या बचेगा ! धर्मनिरपेक्षता को आज कुछ लोग राजनीति से जोड़ने लगे हैं जो सर्वथा अनैतिक है ! सवाल देश और हमारी नयी पीढी की बेहतरी का है, आने बाली पीढी इस देश की धरोहर है, इनका हिंदू - मुसलमान से कुछ लेना देना नहीं है, यह गंदगी हमारे साथ ही ख़त्म होनी चाहिए ! आपलोगों से करवद्ध प्रार्थना है की माहौल बनाये जिससे यह बबूल के पेंड हम मिल कर उखाड़ सकें ! आपका दुबारा आभार, नेकनीयती के साथ आपने आश्वासन दिया !
आपका ईमेल न मिल पाने के कारण यहाँ आपके आश्वासन( शर्म उनको मगर नहीं आती !

) का जवाब दे रहा हूँ !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बहुत अच्छा प्रयास....बहुत बहुत बधाई....

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

nishchit taur par aap ek shandaar prayaas kar rahe hain ...aur yah prayaas aisa hee vyakti kar sakta hai jisne kavita ko aap jaisi nazar se dekha ho .... swagat hai aapka aur aapke is kadam ka ...

रंजना said...

कविता के विषय में आपने जो कहा .... एक एक शब्द मन में उतर गया...बहुत बहुत सही कहा है आपने...

आपका यह सद्प्रयास सफल हो,यही शुभकामना है..

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छा लगा आपका काव्य समीक्षा पर आलेख। बहुत बहुत स्वागत है। अभी डाक्टर अनुराग जी के ब्लाग से आपके ब्लाग का लिन्क मिला। इन्तज़ार है आपकी कविताओं का। शुभकामनायें।

अल्पना वर्मा said...

कविता के विषय में विस्तार से जाना.
हिंदी तथा हिंदी में अनूदित अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं की अनूठी कविताओं का सफल प्रतिनिधि काव्य-मंच यह ब्लॉग बन सके इस के लिए शुभकामनाएँ.

तुषार राज रस्तोगी said...

बहुत खूब | आभार |

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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